Kapurthalaपंजाब की 117 सीटों में डेरे 56 सीटों में प्रभावी, चुनाव नतीजों पर असर डाल सकते?

पंजाब की 117 सीटों में डेरे 56 सीटों में प्रभावी, चुनाव नतीजों पर असर डाल सकते?

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कपूरथला/चंद्रशेखर कालिया: आगामी पंजाब चुनावों में भी डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव रहेगा और कई सीटों पर प्रत्याशियों की जीत या हार में डेरे की भूमिका होगी, खासकर मालवा के इलाके में इस डेरे का ज़्यादा प्रभाव मालवा में ही है. अगर एक या दो फीसदी वोट भी डेरे की वजह से किसी तरफ मुड़ती है तो जिन इलाकों में कांटे की टक्कर होगी वहां उसका बहुत असर होगा.

पंजाब में जिन डेरों का प्रभाव ज़्यादा है उनमें डेरा सच्चा सौदा, राधा स्वामी सत्संग, डेरा नूरमहल, डेरा निरंकारी, डेरा सचखंड बल्लां और डेरा नामधारी शामिल हैं. चंडीगढ़ स्थित इंस्टिट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन की रिसर्च के अनुसार पंजाब की कुल 117 सीटों में से ये डेरे 56 सीटों में प्रभावी हैं और उनमें चुनाव नतीजों पर असर डाल सकते हैं. ज़ाहिर है यही वजह है कि चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियों के नेताओं में इन डेरों का समर्थन हासिल करने की होड़ लग जाती है.

पंजाब में 2007 के विधान सभा चुनावों में डेरा सच्चा सौदा ने अपने अनुयायियों को कांग्रेस पार्टी के लिए वोट करने का निर्देश दिया था. इसका नतीजा ये हुआ कि शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार कई ऐसी जगहों से चुनाव हार गए जिन्हें अकालियों का गढ़ माना जाता था. लेकिन इसके बावजूद भी शिरोमणि अकाली दल पंजाब में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने में सफल रहा और डेरा सच्चा सौदा के साथ उसके संबंधों में खटास आ गयी. 2007 के चुनावों में अकाली दल को 48 और कांग्रेस को 44 सीटें मिलीं थीं. लेकिन अकाली दल की चुनावी पार्टनर बीजेपी को मिलीं 19 सीटों की बदौलत अकाली दल को सरकार बनाने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी.

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि साल 2007 में डेरा सच्चा सौदा ने खुलकर कांग्रेस का साथ दिया था लेकिन अकाली दल सत्ता में आ गया. अकालियों से रिश्ते खऱाब होने का बाद डेरा सच्चा सौदा ने अपना सबक सीख लिया. उसके बाद से डेरा सच्चा सौदा की नीति ये रही है कि वो कहते हैं कि उनकी एक पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी है जो उम्मीदवार को देखकर और निर्वाचन क्षेत्र के लिहाज से समर्थन देने या न देने का फैसला करती है. लेकिन ये माना गया है कि 2007 के बाद डेरा सच्चा सौदा का जो रवैया रहा है वो अकाली समर्थक रहा है. 2012 के पंजाब विधान सभा चुनावों में कैप्टन अमरिंदर सिंह डेरा सच्चा सौदा से समर्थन मांगने के लिए गुरमीत राम रहीम से मिले. लेकिन उस साल डेरे ने किसी भी पार्टी के लिए समर्थन की खुली घोषणा नहीं की. राजनीतिक जानकार कहते हैं कि डेरा अकाली दल से अपने बिगड़े हुए सम्बन्ध सुधारना चाहता था इसलिए उसने अकाली उम्मीदवारों का समर्थन किया.

इस चुनाव में अकाली दल ने अपने पिछले प्रदर्शन को सुधरते हुए 56 सीटें जीतीं. हालांकि अकाली दल की दो लगातार विधान सभा चनावों में ऐतिहासिक जीत को अन्य कारण भी रहे, लेकिन डेरा सच्चा सौदा से मिला समर्थन भी एक बड़ा कारण था. इन चुनावों में कांग्रेस 46 सीटों पर ही जीत पाई. बीजेपी ने इस चुनाव में 12 सीटें जीतीं और फिर एक बार अकाली दल-बीजेपी की सरकार बनी. दो साल बाद 2014 के लोक सभा चुनावों में डेरा सच्चा सौदा ने अकाली दल उम्मीदवार हरसिमरत कौर बादल की बठिंडा से जीत सुनिश्चित करने में भूमिका निभाई. साल 2014 में ही डेरा सच्चा सौदा ने हरियाणा विधान सभा चुनावों में बीजेपी का समर्थन किया और उसकी जीत में एक बड़ी भूमिका निभाई.

हरियाणा विधान सभा के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सिरसा में एक रैली में गुरमीत राम रहीम के प्रति सम्मान व्यक्त किया था. जानकार मानते हैं कि 2017 के पंजाब विधान सभा चुनावों में भी डेरा सच्चा सौदा ने चतुराई से अकाली दल का साथ दिया जिसकी बदौलत अकाली बुरी तरह चुनाव हारने के बावजूद 25 फीसदी वोट-शेयर बरकरार रखने में कामयाब हुए. राजनीतिक जानकार कहते हैं कि पंजाब में एक प्रथा रही है कि डेरा कभी सार्वजानिक तौर पर राजनीतिक पार्टियों को अपने समर्थन की घोषणा नहीं करते थे. लेकिन डेरा सच्चा सौदा ने पहली बार ऐसा खुल के किया.

राम सिंह डेरा सच्चा सौदा की राजनीतिक समिति के अध्यक्ष हैं. उनका दावा है कि डेरा सच्चा सौदा के नेतृत्व का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. वे कहते हैं कि डेरे की राजनीतिक समिति का काम ये है कि जहां कहीं भी डेरे के लोगों को धार्मिक सभाएं करने या लोगों की भलाई के काम करने में दिक्कत आती है तो समिति के लोग राजनीतिक या प्रशासनिक लोगों से संपर्क करके उसका हल निकालें. अगर वाकई ऐसा है तो क्यों राजनीतिक पार्टियों के नेता डेरे का समर्थन मांगने आते हैं?

राम सिंह कहते हैं जो राजनीति से जुड़े लोग हैं वो सिर्फ डेरे में ही नहीं बल्कि सभी जगह जाते हैं. हम देखते हैं कहीं भी अगर दस लोग इक_े हुए हों तो वो वहीँ जाते हैं. इसकी वजह ये है कि उन्हें वोट लेने होते हैं. और देखा जाए तो डेरे का भी वोट बैंक काफी बड़ा है. संगत (डेरे के अनुयायी) अपना विचार कर लेती है कि उनके चुनाव क्षेत्र में कौन सा अच्छा नेता है, कौन अच्छे काम कर रहा है, कौन लोगों को साथ लेकर चल रहा है. वो संगत का अपना विचार होता है न कि डेरे का. जो संगत चाहती है वो फैसला करके फिर उधर वोट डाल देती है.” डेरा सच्चा सौदा की मुश्किलें पिछले कुछ सालों में डेरा सच्चा सौदा की मुश्किलें बढ़ी हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पिछले चुनावों के मुक़ाबले इस बार के पंजाब चुनावों में राजनीतिक पार्टियां डेरा सच्चा सौदा का समर्थन तो चाहेंगी लेकिन साथ ही चाहेंगी कि ऐसा खुल के न हो. राजनीतिक जानकार कहते हैं कि कि इस बार डेरा सच्चा सौदा का किसी भी पार्टी को खुला समर्थन उस पार्टी को भारी पड़ सकता है. क्यूंकि जो साल 2015 में गुरु ग्रन्थ साहिब की कथित बेअदबी का मामला है उसमें डेरा सच्चा सौदा के लोगों पर आरोप लगा है. इस बार के पंजाब चुनाव प्रचार के दौर में कई राजनीतिक नेता जालंधर स्थित डेरा सचखंड बल्लां के चक्कर लगा चुके हैं.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने नए साल की शुरुआत डेरा सचखंड बल्लां जाकर की. पिछले साल के आखिरी दिन अकाली नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल भी इस डेरे पर गईं थी. पिछले साल सितम्बर में पंजाब के नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी उप-मुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा के साथ डेरा सचखंड बल्लां गए थे. इससे पहले अगस्त के महीने में पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू भी इस डेरे पर गए थे. डेरा सचखंड बल्लां रविदासिया समुदाय का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है. लेकिन ये समझना मुश्किल नहीं है कि राजनीतिक नेताओं का इस डेरे पर इस समय जाने की वजह पंजाब में आगामी विधान सभा चुनावों से जुड़ी हुई है.

इस डेरे के ज़्यादातर अनुयायी अनुसूचित जातियों से सम्बन्ध रखते हैं और राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि अगर वो अगर डेरे के नेतृत्व का समर्थन हासिल कर लेंगे तो चुनावों में डेरे के अनुयायी उनके पक्ष में वोट करेंगे. अगर किसी राज्य की कुल आबादी में अनुसूचित जातियों का प्रतिशत देखें तो पंजाब की कुल आबादी में से करीब 32 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जातियों की है जो किसी भी अन्य राज्य के मुक़ाबले सबसे अधिक है. चुनावी मौसम में कोई भी राजनीतिक दल इस बड़े समुदाय के वोटों को खोना नहीं चाहता और यही वजह है कि चुनावों के समय ऐसे डेरों का महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है और राजनीतिक पार्टियां इनके चक्कर लगाना शुरू कर देती हैं.

पंजाब में डेरों का उदय ऐसा माना जाता है कि पंजाब में डेरों का उदय होने की बड़ी वजह सामाजिक भेदभाव है और इसीलिए इन डेरों के ज़्यादातर अनुयायी समाज के तथाकथित निचले तबकों से आते हैं. राजनीतिक जानकार कहते हैं कि डेरे जैसी जगहों में सभी को बराबर समझा जा रहा है और किसी किस्म का भेदभाव नहीं हो रहा तो वो डेरों की तरफ आकर्षित होते हैं. आम आदमी पार्टी का प्रभाव भी मालवा के इलाके में है और डेरा भी वहीँ प्रभावी है. आम आदमी पार्टी भी डेरे का समर्थन हासिल कर सकती है पर ये खुले तौर पे नहीं होगा. 2017 के चुनावों में डेरे ने अकाली दल का समर्थन किया था. क्या इस बार भी ऐसा होगा?

अकाली दल पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) का प्रभाव् है और एसजीपीसी डेरे के बिलकुल खिलाफ है. अकाली दल सिखों का प्रतिनिधित्व करती है और सिख अभी भी इस बात से नाराज़ हैं कि डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को ईशनिंदा के मामले में अकाल तख़्त से माफ़ी दिलवाने में अकाली दल की भूमिका थी ? 2015 में पंजाब में हुई गुरु ग्रन्थ साहिब की कथित बेअदबी की घटनाओं के सिलसिले में डेरा सच्चा सौदा के कुछ अनुयायियों को गिरफ्तार किया गया.

ये गिरफ्तारियां 2017 में बनी कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस सरकार के दौरान हुईं. इस वजह से डेरे में कांग्रेस के प्रति रोष है. डेरे का कहना ये रहा है कि उसके अनुयायियों का बेअदबी की घटनाओं से कोई लेना-देना नहीं था. पृथ्वी सिंह कहते हैं, “डेरे के लोगों पर बेअदबी के आरोप लगाने के पीछे पंजाब की मौजूदा सरकार का पूरा हाथ है. इसकी वजह ये है कि 2017 के पंजाब चुनावों में डेरे के लोगों ने अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन का समर्थन किया था.

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि कांग्रेस अगर डेरे का समर्थन लेगी तो वो व्यक्तिगत स्तर पर होगा न कि संगठन के स्तर पर. ये समर्थन निर्वाचन क्षेत्र के हिसाब से होगा. जो प्रत्याशी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे और अगर उनके सम्बन्ध डेरे से अच्छे हैं वो व्यक्तिगत स्तर पर डेरे से समर्थन लेंगे. लेकिन संगठन के स्तर पर कांग्रेस का डेरे से समर्थन मांगना या डेरे का कांग्रेस को समर्थन देना मुमकिन नहीं होगा. हरियाणा में 2014 और 2019 के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत में भी डेरा सच्चा सौदा ने एक बड़ी भूमिका निभाई थी. तो क्या पंजाब में डेरा बीजेपी का समर्थन करेगा ? अतीत में बीजेपी ने डेरे को पूरा समर्थन दिया. उसके बावजूद जो गुरमीत राम रहीम की हालत हुई और वो जेल पहुँच गए. इस वजह से डेरे के लोग बीजेपी के खिलाफ रहेंगे.

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